नागपुर में पोला तनहा पर्व के दूसरे दिन शुक्रवार को रही ऐतिहासिक मारबत महोत्सव की धूम, 145 बरस पुराने अद्भुत आयोजन के साक्षी बनने पहुचे देश, विदेश के लोग और फिल्मी सितारे…

बिलासपुर/ मध्य नागपुर का ऐतिहासिक और अद्भुत मारबत महोत्सव तनहा पोला पर्व के दूसरे दिन शुक्रवार को मनाया गया। 145 साल पुराने इस पर्व को देखने विदेशी मेहमान, बॉलीबुड के सेलिब्रेटी सब पहुँचे। इस अवसर पर ब्रिटिश शासन, महामारियों, बीमारियों और बुरी ताकतों के प्रतीक पीले (पुतले) मारबत और अंग्रेजों का साथ देने वाली भोंसला राजघराने की रानी बंकाबाई के प्रतीक काली मारबत के प्रति आक्रोश व्यक्त किया गया और पूजा अर्चना कर मारबत को जलाया गया। इसके साथ ही समकालीन बुराइयों जैसे महंगाई, भ्रष्टाचार, पाकितान की करतूतों और बुरी आदतों को दर्शाने वाले पुतले (बड़ग्या) भी निकाले गए।
शहर के मुख्य इलाके नेहरू पुतला से होते हुए 10 किलोमीटर के दायरे में काली और पीली मारबत व बडग्या के पुतले को भृमण कराया गया जिसमे शानदार बाजेगाजे व झांकियों की झलक पाने रेलमपेल मची रही। नेहरू पुतला के पास जब काली और पीली मारबत का मिलन हुआ तो उनके इस मिलन को देखने भकारी जनसमूह उमड़ा लोग घरो की बालकनी व छतों से इस नजारे को देखने जुटे रहे।

ये है मारबत…
बांस, लकड़ी, घास और पुराने कपड़ों से बड़े-बड़े पुतले बनाए जाते हैं, जिन्हें मारबत और बड़ग्या कहा जाता हॉ, इन्हें समाज की बुराइयों, बीमारियों, संकट, अंधविश्वास और नकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है। यही वजह है कि शोभायात्रा के दौरान “ईडा पीडा, रोगराई घेऊन जा गे मारबत” (हे मारबत, हमारे सारे कष्ट और बीमारियाँ ले जाओ) का जयघोष किया जाता है।
और बमलहरी की रही धूम

जुलूस में महाकाल और उनके गणों की मशान में होलो खेलने के अद्भुत दृश्य को कैमरे में कैद करने लोगो का हुजूम लगा रहा,,, बजगवां भोलेनाथ और उनके गयं मशान की राख से होली खेलते रहे… और उन्हें देखने दर्शक रेलमपेल करते दिखे…
जैकी श्रॉफ और सुभाष घई रहे मेहमान
इस अद्भुत मारबत उत्सव की देश और विदेशो तक धूम है, विदेशी मेहमान इस आयोजन को देखने के लिए पहुचे तो आयोजको और कार्यकर्ताओं का जोश बढाने फ़िल्म अभिनेता जैकी श्रॉफ, फ़िल्म निर्माता सुभाष घई और महाराष्ट्र के दिग्गजनेता भी पहुंचे।
देर रात तक सड़को पर दिखा रेला
शहर के अलग-अलग इलाको से काली, पीली मारबत और
बड़ग्या के सैकड़ो पुतले निकाली गए इज़के बाद रात को सभी जगह बुराई के प्रतीक पुतलों का दहन कर अला बला काटने और परिवार के सुख समृद्धि की कामना की गई।
1880-85 में ब्रितानिया सरकार के खिलाफ सन्देश देने की शुरुआत
बताया जा रहा कि इस महोत्सव की शुरुआत ब्रिटिश राज के दौरान लगभग 1880-1885 के आसपास हुई थी। लोग खुलकर अंग्रेजों का विरोध नहीं कर सकते थे, इसलिए अपनी नाराजगी और सामाजिक संदेश को इन पुतलों के जरिए व्यक्त कर एकजुट करने उस समय यह बड़ा जरिया रहा।
मारबत के साथ-साथ ‘बड़ग्या’
मारबत के साथ साथ इस महोत्सव के दौरान बडग्या
के पुतले भी निकाले जाते हैं, जो भ्रष्टाचार, महंगाई या अन्य सामाजिक समस्याओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।
बुराई के अंत का प्रतीक
मध्य नागपुर की गलियों में लगभग 10 किलोमीटर तक विशाल शोभायात्रा के दौरान लोग पारंपरिक नारे लगाते हैं जैसे – ‘इडा, पीड़ा घेउन जा गे मरबत’ (यानी हमारे सारे कष्ट और बीमारियां अपने साथ ले जाओ)। यात्रा के अंत में इन पुतलों का दहन (अग्निदाह) किया जाता है, जो बुराई के अंत का प्रतीक है।

ये भी है मान्यता
मान्यता ये भी है कि मारबत कंस द्वारा बालकाल में भगवान श्रीकृष्ण को मारने के।लिए भेजी गई एक मायावी और शिशु-हत्यारी राक्षसी थी, जो सुंदर स्त्री का रूप धारण कर मदन गोपाल श्री कृष्ण को मारने गोकुल नंदगाँव आई थी।पूतना ने अपने स्तनों पर ‘कालकूट’ नामक भयंकर विष लगा रखा था और वह बालकृष्ण को स्तनपान कराने लगी ताकि उनकी मृत्यु हो जाए। पर बालक श्री कृष्ण ने दूध के साथ-साथ उसके प्राण भी खींच लिए। अपने वास्तविक राक्षसी स्वरूप में आकर वह मृत होकर गिर पड़ी। यही वजह है कि सभी पुतलों को काली मारबत का स्तनपान कराया जाता है, माताएं अपने बच्चों को भी पूतना के प्रतीक पुतले का स्तनपान करा रोग- दोष से बचाने मानता मानते है, और आला बला काटने के लिए पुतला दहन के पहले पूतना के पुतले का बाल से केस खींचकर अपने घरों के दरवाजों पर बांधते है ताकि उनके घरों में सुख समृद्धि बनी रहे सारी अला- बला बीमारियां पीड़ा मारबत अपने साथ ले जाये।



