
0 समझौते और मांडवाली के बाद शिकायत वापस लेने से क्या कॉपी हो गया ब्रांडेड
0 क्या असली नकली के जांच का महकमे के पास नही कोई विकल्प
बिलासपुर / पढ़ावत हे ददा, पढ़ावत हे दाई टूरी निकल गए मंटोरा बाई…! पुलिस महकमे के लगातार कार्यशाला और प्रशिक्षण के बाद भी विवेचना के तौर-तरीके सुधार के दावों का क्या हाल है आप भी जान लीजिए मामला शहर एक नामचीन होटल के ब्रांडेड कपड़े के 80% छूट वाले सेल का है। जो तब प्रकाश में आया जब कपड़ा खरीदने वाले युवकों ने दूसरे दिन खरीदे गए कपड़ो को कॉपी बताकर वापस करना चाहा तो सेल के मैनेजर ने बिका माल वापस लेने मना कर दिया। मामला सिविल लाइन पहुँचा देर रात तक थाने में गहमा- गहमी और मांडवाली के बाद मैनेजर कपड़े वापस लेकर पैसा वापस देने सहमत हो गया, तो शिकायतकर्ता ने शिकायत वापस लेकर मामले का तो पटाक्षेप कर दिया पर कई सवाल भी खड़े कर दिये, कि जब कपड़े ब्रांडेड थे तो युवकों ने वापस किया क्यो, और शिकायत वापस लेली तो क्या शहर के अन्य लोगो को बेचा गया जैसा कि शिकायत है अब्राण्डेड(कॉपी) कपड़े क्या ब्रांडेड हो गए, इसका जवाब नही मिल पाया।

मामले में शिकायतकर्ता ने सिविल लाइन थाने में लिखित शिकायत देकर ब्रांडेड कपड़ों की सेल में कथित तौर पर कॉपी माल बेचे जाने का आरोप लगाया था। शिकायतकर्ता ने पुलिस को सेल से मिले मेसर्स/ अयाज खान इंटरप्राइजेज के नाम से मिले 27 हजार के जीएसटी नम्बर वाले 3 बिल भी शिकायत के साथ प्रस्तुत किया था…
ये रहा बिल…
पुलिस ने कहा
शिकायत पर सेल के मैनेजर को लाया गया था, कपड़ा खरीदने वाले युवकों और मैनेजर के बीच आपस मे समझौता हो गया, युवकों ने कपड़े देकर पैसा और शिकायत वापस ले लिया इसलिए कोई मामला ही नही बनता । जहा तक कपड़ो के अब्रांडेड और कॉपी होने का सवाल है तो इसकी जांच के लिए पुलिस के पास कोई सिस्टम नही है।
बिल से क्लियर हो सकता है
एक ब्रांडेड कपड़े के शो रूम के संचालक का कहना है कि इसकी जांच का एक ही तरीका है, यदि कपड़े ब्रांडेड है तो मैनेजर और संचालक से सम्बंधित कम्पनियों से सम्बंधित ब्रांड के बिल मांगना चाहिए, यदि अधिकृत बिल है तो कपड़े ब्रांडेड है और नही है तो फिर कॉपी है नकली है।
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कार्यशालाओं और प्रशिक्षण के जरिए पुलिस की विवेचना को बेहतर बनाने के दावे अपनी जगह हैं, लेकिन ऐसे मामलों में जांच की प्रक्रिया कितनी प्रभावी है, यह सवाल अपनी जगह कायम है। आखिर शिकायत में लगाए गए आरोपों की पड़ताल का रास्ता क्या सिर्फ शिकायतकर्ता के पीछे हटने से बंद हो जाना चाहिए?
ये बड़ा सवाल हैं।
