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0 स्कूल वही, बिल्डिंग वही लबादा नया
0 शिक्षकों का टोंटा कही लैब अटेंडेंट तो कही दूसरे कर्मचारी ले रहे क्लास
0 हिंदी, इंग्लिश मीडियम दोनो फूल,रोज लौट रहे पालक- विद्यार्थी
बिलासपुर/ शिक्षा का अधिकार, आगू आगू बढ़े चला नोनी बाबू पढ़े चला के सारे चोचले सरकारी होर्डिंग्स तक सीमित है। एक तरफ शाला प्रवेश के लिए लइका पकडैया टाइप टीचरों को लगाया गया है। वही प्रवेश के लिए पहुचने वाले विद्यार्थियों को स्कूल से यह कहकर लौटाया जा रहा कि सीटें फूल हो गई है जगह नही है। लगभग सारी सरकारी योजनाओं और उनके दावों के यही हाल है। स्थिति यह है कि तत्कालीन कांग्रेस शासन काल की सबसे हिट स्वामी आत्मानन्द स्कूल योजना का सत्ता परिवर्तन के बाद हाल बेहाल है।
“सीजीडीएनए” की टीम ने गुरुवार को शहर के स्वामी आत्मानन्द स्कूलों का जायजा लिया, वहाँ के प्रिंसिपल और टीचरों से चर्चा का प्रयास किया, पर सबने सामने कैमरे आकर कुछ कहने से इंकार कर दिया। इस दौरान जो बातें सामने आई उसने शिक्षा विभाग के तमाम दावों की पोल खोलकर रख दी। कुल मिलाकर शिक्षा महकमे का हाल चना है तो दांत नही और दांत है तो चना नही जैसा दिखा।
जिन सरकारी स्कूलों में रिक्शा और ठेले खोमचे वाले तक अपने बच्चों को नही पढ़ाना चाहते थे, प्रदेश की तत्कालीन भूपेश सरकार ने वहां कायाकल्प और शिक्षकों की नियुक्ति कर हिंदी के साथ- साथ इंग्लिश मीडियम स्वामी आत्मानन्द स्कूल शुरू कराया। जिन सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियो के स्ट्रेंथ का रोना था वहाँ प्रवेश के लिए रेलमपेल मच गई। यहां प्रवेश के लिए लॉटरी निकालनी पड़ी, लोग अपने बच्चों को एडमिशन दिलाने सांसद, विधायक और मंत्रियों के अनुशंसा पत्र लेकर आने लगे। इंग्लिश मीडियम के लिए हर क्लास में 50- 50 सीटें तय की गई वही हिंदी मीडियम को अनलिमिटेड कर निर्देश दिया गया कि सभी बच्चों को प्रवेश दिया जाना है, कोई भी बच्चा प्रवेश से वंचित न हो इसका ध्यान रखे, पर दिक्क्त ये है कि हिंदी मीडियम में एक- एक क्लास में 100-100, 150-150 के करीब विद्यार्थी है, पर कमरे नही है, इसलिए हिंदी मीडियम के विद्यार्थियों और पालकों को रोज जगह नही है कहकर लौटाया जा रहा सवाल यह उठ रहा कि आखिर ये निर्धन बच्चे कहा जाए क्योकि शिक्षा का अधिकार तो सभी को है पर इन दावों के लिए इंतेजाम ही नही है।

कि टोंटा टीचरों का, लैब अटेंडेंट ले रहे क्लास
एआज की डेट में स्वामी आत्मानन्द स्कूलो का हाल बेहाल है, जो कांग्रेस शासनकाल में बेहद हिट रही। इन स्कूलों में टीचरों का टोंटा पड़ा हुआ है, ज्यादातर टीचर पदोन्नत होकर प्रिनिसिपल बनकर दूसरे स्कूलो में चले गए, उनके बदले किसी की नियुक्ति ही नही की गई। विषयवार टीचर न होने के कारण कही इंग्लिश मिडिगम के टीचरों की ड्यूटी लगाकर काम चलाया जा रहा तो कही लैब अटेंडेंट और बाबू बच्चों को पढा रहे है।
यूकेजी एलकेजी बन्द
आलम ये है कि सत्ता परिवर्तन के बाद फंड का टोंटा बताकर शासन- प्रशासन ने हाथ खड़े कर दिए जिससे यूकेजी और एलकेजी बन्द करने की नौबत आ गई।
अब लगेगी फीस
तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने जिन आत्मानन्द स्कूलो के संचालन मुफ्त को लेकर खूब तारीफ बटोरी उन्ही आत्मानन्द स्कूलो में अब फीस का फरमान जारी कर दिया गया। यानी अब शिक्षा मुफ्त नही बल्कि कीमत चुकानी पड़ेगी।
शिक्षा माफियाओं के खेल तो नही
कांग्रेस शासनकाल में स्वामी आत्मानन्द स्कूल शुरू हुआ तो लोग अपने बच्चों को निनी स्कूलो से निकालकर यहाँ प्रवेश दिलवाने पहुँचने लगे, निजी स्कूल संचालको के स्कूलो के स्ट्रेंथ 40 से 50 परसेंट तक कम हो गए, अब यहां यूकेजी, एलकेजी बन्द होने के कारण पालकों को फिर निजी स्कूलों में प्रवेश के लिए चक्कर काटने पड़ रहे है ये तकनीक पब्लिक भी खूब समझ रही है…
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