
बिलासपुर। न्यायधानी के सकरी में चार साल पूर्व हुए चर्चित हिस्ट्रीशीटर संजू त्रिपाठी के सनसनीखेज सुपारी हत्याकांड के 22 आरोपियों के अदालत से दोषमुक्त होने की खबर को लेकर जनमानस में ग़म्भीर प्रतिक्रिया है। सीजीडीएनए न्यूज़ ने सोमवार को इस मामले को लेकर बिलासपुर रेंज के आईजी रामगोपाल गर्ग से चर्चा कर जानना चाहा कि
जिस हत्याकांड की गूंज पूरे प्रदेश में रही, बड़े बड़े दावे किए गए उसमें पुलिस की जांच और साक्ष्य संकलन की मजबूती अदालत में क्यों नहीं टिक सकी? आगे क्या करेंगे… इसकी पुनरावृत्ति रोकने क्या कदम उठाये जाएंगे…?

आईजी श्री गर्ग ने कहा कि माननीय न्यायालय के फैसले की समीक्षा कर वैधानिक कार्रवाई की जाएगी। दोषमुक्ति के निर्णय के विरुद्ध अपील के आधार तय कर अपील करने कार्रवाई की जाएगी।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि मामले की विवेचना में पुलिस अधिकारियों की ओर से कोई त्रुटि या कोताही सामने आती है तो उसके लिए भी निर्धारित प्रक्रिया के तहत जिम्मेदारी तय की जाएगी। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार प्रत्येक माह दोषमुक्ति के मामलों की समीक्षा की जाती है। इस प्रकरण की भी समीक्षा कर आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।
ई-साक्ष्य से कमजोर विवेचना पर लगाम लगाने की तैयारी
एक सवाल के जवाब में आईजी श्री गर्ग ने कहा कि
नए आपराधिक कानूनों के तहत भारत सरकार और राज्य सरकार के निर्देशानुसार जब्ती और अन्य कार्रवाई में ई-साक्ष्य के उपयोग पर जोर दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य साक्ष्यों को अधिक विश्वसनीय बनाना और अदालत में गवाहों के मुकरने जैसी समस्याओं से निपटना है।
आईजी श्री गर्ग ने कहा कि तकनीक के इस्तेमाल से विवेचना की उन कमियों को धीरे-धीरे दूर किया जा सकेगा, जिनका लाभ आरोपियों को मिलता रहा है। पुलिस मुख्यालय के निर्देश पर नए कानून लागू होने के बाद से विवेचकों के लिए लगातार कार्यशालाएं आयोजित की जा रही हैं। इनका उद्देश्य जांच की गुणवत्ता सुधारना, तकनीकी साक्ष्यों का बेहतर इस्तेमाल करना और अपराधियों को कानून के मुताबिक उनके अंजाम तक पहुंचाना है।
लेकिन सवाल अब भी बाकी है…
पब्लिक में चर्चा ये है कि संजू त्रिपाठी हत्याकांड का फैसला पुलिस महकमे के लिए महज एक और दोषमुक्ति का आंकड़ा बनकर न रह जाए। समीक्षा, कार्यशाला और तकनीक के इस्तेमाल की बातें अपनी जगह हैं, लेकिन असली कसौटी जवाबदेही है। विवेचना में चूक हुई तो किसकी थी, चूक जानबूझकर हुई या लापरवाही से, और उसके लिए क्या कार्रवाई होगी? और कब तकऔर होगी भी की नही आमजनमानस का यही सवाल है।
क्योंकि अदालत में आरोपियो का दोष साबित करना पुलिस की जिम्मेदारी है, लेकिन कमजोर विवेचना के कारण गंभीर अपराधों के आरोपियों को लाभ मिलना पूरे कानून-व्यवस्था तंत्र के लिए बेहद चिंताजनक संकेत है। अपराध पर अंकुश लगाने के लिए सिर्फ गिरफ्तारी नहीं, ऐसी पुख्ता विवेचना भी जरूरी है जो अदालत की कसौटी पर खरी उतरे और एक नजीर बने कड़ा संदेश जाए…!
