
बिलासपुर। सेंट्रल जेल की सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाले अफसरों के सामने अब जेल की चारदीवारी के बाहर से नई चुनौती खड़ी हो गई है। रोटरी मार्ग पर जेल की दीवार से ऊंची एक और इमारत आकार ले रही है। यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी जेल की चहारदीवारी से ऊंचे भवन के कारण सुरक्षा और गोपनीयता को लेकर सवाल उठ चुके हैं। खास बात यह है कि जेल के भीतर दो बार बाहरी सामग्री फेंके जाने की घटनाएं भी हो चुकी हैं। और दूसरा जेल के अंदर 9 नक्सलाइट आरोपी भी बन्द है, इसके बावजूद दीवार के पीछे ऊंची इमारतों का सिलसिला थमता नजर नहीं आ रहा।
पहले भवन को लेकर शिकायत के बाद प्रशासनिक हस्तक्षेप हुआ था। भवन मालिक ने बालकनी और छत की तरफ ऊंची दीवार खड़ी कर दृश्यता रोकने की व्यवस्था की थी, लेकिन अब वहां प्लास्टिक का पर्दा दिखाई दे रहा है। इसी कतार में एक और निर्माणाधीन भवन खड़ा हो रहा है। जेल प्रशासन को आशंका है कि ऊंचाई का फायदा उठाकर कोई भी व्यक्ति जेल परिसर के भीतर प्रतिबंधित सामग्री फेंक सकता है या बंदियों को निशाना बना सकता है।
जेल प्रशासन ने जिला और नगर निगम प्रशासन को पत्र लिखकर आपत्ति दर्ज कराई है। निगम से निर्माण की जांच कर कार्रवाई की मांग की गई है, वहीं जिला प्रशासन से संवेदनशील जेल परिसर को ड्रोन फ्री जोन घोषित करने का आग्रह किया गया है। जेल मुख्यालय को भी पूरे मामले से अवगत करा दिया गया है।
लगातार शिकायतों और पत्राचार के बाद सोमवार को निगम अधिकारियों ने रोटरी मार्ग स्थित निर्माणाधीन भवन का निरीक्षण किया। अधिकारियों ने भवन की छत से जेल परिसर और भीतर बने सेल की दृश्यता का जायजा भी लिया। अब देखना है कि निरीक्षण के बाद कोई ठोस कार्रवाई होती है या फाइलों में ही सुरक्षा की दीवार खड़ी कर दी जाती है।

1142 बंदी क्षमता से ज्यादा, सुरक्षा पर दोहरी चुनौती
बिलासपुर सेंट्रल जेल की स्वीकृत क्षमता 2290 बंदियों की है, जबकि जेल प्रशासन के दिए आंकड़ों के मुताबिक यहां 3228 पुरुष और 204 महिला सहित कुल 3432 सजायाफ्ता और विचाराधीन बंदी निरुद्ध हैं। यानी क्षमता से 1142 बंदी अधिक। इनमें 9 नक्सली बंदी भी शामिल हैं। (यहां दिए गए पुरुष-महिला आंकड़ों का कुल योग 3432 है, इसलिए अतिरिक्त बंदियों की संख्या 1142 बैठती है।)
इतनी बड़ी आबादी वाले संवेदनशील परिसर में दो बार सामग्री फेंके जाने की घटनाएं और अब दीवार के पीछे एक और ऊंची इमारत का निर्माण सुरक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती है। सवाल यह भी है कि जब जेल की बाहरी सुरक्षा और गोपनीयता ही खतरे में है तो जिम्मेदार महकमे समय रहते ठोस कदम क्यों नहीं उठा पाए?
एक जेल के लिए स्टाफ नहीं, दो जेल कैसे संभालेंगे?
बिलासपुर सेंट्रल जेल की कम क्षमता को देखते हुए लंबे समय से बड़े जेल परिसर की मांग के बाद शहर से लगे ग्राम बैमा में 1500 बंदियों की क्षमता वाली नई जेल को मंजूरी मिली। लेकिन यहां भी सरकारी योजना का गणित समझ से परे है। मौजूदा जेल में ही स्टाफ की कमी की शिकायत है, ऐसे में दो-दो जेलों का संचालन आखिर किस अमले से होगा?
अब तक आम धारणा यही थी कि बैमा में नई जेल बनने के बाद शहर के बीच स्थित सेंट्रल जेल वहां शिफ्ट हो जाएगी और मौजूदा परिसर का दूसरे उपयोग में लाया जाएगा। लेकिन योजना के मुताबिक दोनों जेलें अलग-अलग संचालित होंगी। यानी एक जेल के लिए पर्याप्त स्टाफ जुटाना मुश्किल और अब दो जेलों की जिम्मेदारी भी उसी व्यवस्था पर!
एक तरफ जेल की क्षमता से कहीं ज्यादा बंदी, दूसरी तरफ दीवार के बाहर ऊंची इमारतों से सुरक्षा का खतरा और तीसरी तरफ नई जेल के लिए स्टाफ का सवाल। सरकारी योजनाओं में भवन और क्षमता का हिसाब तो दिख रहा है, लेकिन सुरक्षा और मानव संसाधन का हिसाब कौन लगाएगा?
