
0 सालो से चले आ रहा लेबर सप्लाई के नाम पर खेल

0 श्रमिक है भी या फर्जी मस्टररोल की तर्ज पर चल रहा सिंडिकेट का जादू
बिलासपुर/ 6 बार के पार्षद और एमआईसी सदस्य रहे पार्षद पति की सुशासन तिहार के दौरान सोशल मीडिया पर सफाई व्यवस्था को लेकर किये गए सवाल और लगाए गए ग़म्भीर आरोपो व चेतावनी ने कई सवाल खड़े कर दिए है। सदन के दौरान भी सदस्यों ने सफाई कर्मी न होने की बात रखी थी, जिनमे सत्तापक्ष के सदस्य भी शामिल रहे। सवाल यह उठ रहा कि सफाई कार्य के लिए ठेकेदारों से लिये गए लेबर आखिर सफाई के बजाय किनके बंगले की सफ़ाई कर रहे,,, या वे अस्तित्व में ही नही है क्योंकि अब तक के अफसरो ने कभी हेडकाउंटिंग तो कराई नही।
ठेकेदारों के द्वारा नगर निगम के जिम्मेदार अफसरो को श्रमिको की जो सूची दी गई है वो श्रमिक है कहाँ,,, ये बड़ा सवाल है, जाहिर है कि सभी आठो जोन में जोन स्तर पर ठेकेदारों से सफाई कार्य के लिए लेबर लिए गए है, किसी ने 40 तो किसी ने 50 लेबर सप्लाई करना दर्शाया है इनके नाम पर लोकल ठेकेदारों को सालो से भुगतान किया जा रहा, तो फिर इतने सीनियर पार्षद और स्वास्थ्य विभाग के चेयरमेन रहे पार्षद पति को ऐसे सोशल मीडिया पर क्यो नाराजगी जाहिर करनी पड़ रही, क्यो भरे सदन में विपक्ष तो विपक्ष सत्ता पक्ष के पार्षदो को अपने वार्डो की सफाई के लिए सफाई कर्मी न मिलने का रोना – रोना पड़ा… अफसरो ने इन शिकायतों पर क्या संज्ञान लिया… कुछ नही…?



तब है-ये हाल
शासन ने प्रशासनिक कसावट और योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन के लिए राजधानी रायपुर के अलावा, बिलासपुर, कोरबा, दुर्ग, और रायगढ़ में आईएएस अधिकारियों को आयुक्त पदस्थ करने का निर्णय ले रखा है, बिलासपुर में भी पूर्व निगम आयुक्त एमए हनीफी के बाद आईएएस अफसरों की पदस्थापना रही… पर किसी ने यह जानने की कोशिश नही की।
होनी चाहिए जांच-
सवाल यह उठ रहा कि जब नागरिक टैक्स दे रहे, ठेकेदार से सफाई कार्य के लिए लेबर लिए जा रहे है, तो उन्हें मूलभूत सुविधाएं क्यो नही दी जा रही”। आखिर वो लेबर कहा है और क्या कर रहे और है भी कि नही क्या इस बात की जांच नही होनी चाहिए,,, क्योकि पैसा तो जनता के टैक्स का है…
एडवांस घोटाला, निबटा दिए गए अधिकारी
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एक अफसर द्वारा ठेकेदार की बेगारी कराने और इसका विरोध करने पर कार्रवाई की धमकी ने उस समय सबकी पोल खोल दी, बवाल हुआ, वाहन चालकों ने पम्प हाउस में गाड़ी खड़ा कर काम बंद हड़ताल कर दिया, उस समय के निगम आयुक्त ने उस समय के उपायुक्त को मामले को शांत कराने भेजा, तो कर्मचारियों ने ठेकेदार द्वारा हर माह आधा वेतन देने और अफसेंट दर्शाकर आधा काटने की शिकायत की। उपायुक्त ने ठेकेदार से जवाब तलब किया तो ठेकेदार ने काटी गई राशि को एडवांस बता दिया। विभागों से पेमेंट का रिकॉर्ड मंगाकर चेक किया गया तो कर्मचारियो को पेमेंट का आधा हिस्सा एडवांस देना दर्शाया गया था, जब उपायुक्त ने पेमेंट शीट दिखाई गई तो कर्मचारियो ने हस्ताक्षरों को फर्जी बताते हुए साफ कह दिया कि ये उनके हस्ताक्षर ही नही है। एडवांस तो ठेकेदार ने कभी ढिया ही नही वो तो खुद 3-3, 4-4 माह में एक बार लटपट एक माह का मेहनताना दे रहे, उनके लिखित बयान दर्ज किए गए, लाखो नही करोड़ो के एडवांस घोटाले के सामने आने पर जब शिकंजा कसा गया तो आरोप है कि नेताओ के करीबी ठेकेदारों ने जांच कर रहे उपायुक्त को निबटा दिया उनका ट्रांसफर करा दिया ।
क्योकि सबको पता है कि निगम में अपने भाई- भतीजो और दूसरे के नाम पर ठेका चलवा कौन और कैसे रह और कैसे इसके नाम पर लगातार खेला हो रहा…
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