
बिलासपुर। देश की सबसे बड़ी और अनुशासित भारतीय पार्टी में सम्भवतः ऐसे पहली बार हुआ है जब केंद्रीय संगठन नेतृत्व एक साल में राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रदेश की भाजपा सरकार और संगठन 1 साल 8 माह में मंत्रिमंडल का विस्तार नही कर स्का जाहिर है कि खींचतान है, जिसके चलते लगातार पार्टी नेतृत्व इसे टालते आ रहा।

5 साल साढ़े 6 माह पहले गत जनवरी 2020 को को पार्टी ने वरिष्ठ नेता जगत प्रकाश नड्डा को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त किया था। सितंबर 2022 में उनके कार्यकाल में 2024 तक वृद्धि करते हुए उन्हें 2024 तक पुनः अध्यक्ष घोषित कर दिया गया। साल भर होने को।है लेकिन पार्टी अब तक नये अध्यक्ष का चयन नही कर सका।
यही हाल छत्तीसगढ़ के प्रदेश मंत्रिमंडल का है, 90 विधानसभा वाले छत्तीसगढ़ में 13 से 14 मंत्री के पद है, और वर्तमान में सीएम समेत 11 मंत्री है, 2 से 3 मंत्रिपद 1 साल 8 मलह से रिक्त है, जब भी प्रदेश के मुखिया का दिल्ली दौरा होता है या केंद्र से नेताओ का आगमन होता है मंत्रिमंडल विस्तार की अटकलें तेज हो जाती है पर होता कुछ नही।
नेताओ के पिछलग्गू से लेकर जनता और विपक्ष तक टकटकी लगाए देख रही कि आखिर फ़ंडा क्या चल रहा, पार्टी अपने नए चेहरे वाले फंडे पर अटल रहती है या फिर पुराने चेहरों को फिर से मौका देगी सबकी नजर इसी पर है।

ये है स्थिति-

पहले 16 जिले थे तब मध्यप्रदेश शासनकाल से लेकर छत्तीसगढ़ तक प्रदेश मंत्रिमंडल में बिलासपुर का जोरदार दबदबा था। तब बिलासपुर जिले से 4-4, 5-5 मंत्री, प्रदेश अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और नेताप्रतिपक्ष तक बिलासपुर से ही हुआ करते थे पर 2018 के बाद से वो दौर ही थम गया आज बिलासपुर से कोई मजबूत प्रतिनिधित्व नही है हालाकि उपमुख्यमंत्री का लोकल निवास और शासकीय बंगला बिलासपुर से है पर वे लोरमी विधानसभा से है।
जिलों की संख्या 16 से बढ़कर 33 हो गई इसलिए अब जिलों के बजाए संभागवार और जातिगत समीकरण को साधने फोकस है।
प्रदेश में 5 सम्भाग है, बिलासपुर सम्भाग से 1 उपमुख्यमंत्री और 2 मंत्री है जिससे इस सम्भाग का कोटा पूरा हो गया ऐसा माना जा रहा।
सबसे ज्यादा प्रतिनिधित्व सरगुजा सम्भाग को मिला है यहां से खुद मुख्यमंत्री और एकमात्र महिला मंत्री समेत 4 मंत्री है।
जबकि दुर्ग सम्भाग से उपमुख्यमंत्री समेत कुल दो मंत्री ही है। वही रायपुर और बस्तर संभाग को केवल 1-1 मंत्री मिले है। ऐसे में रायपुर और बस्तर संभाग से मंत्री बनाये जाने की अटकलें है, पर कब तक ये तय नही है क्यो की तारीख पर तारीख वाला फ़ंडा कई बार फेल हो चुका है, इस बार भी 15 अगस्त के पहले का लॉलीपॉप फेका गया था आज 14 अगस्त बीत गया फिर कुछ नही हुआ…
आखिर इसकी वजह है क्या-
भारतीय जनता पार्टी में एक जमाना था जब पार्टी।नेतृत्व जिसके नाम की घोषणा करता था, उसे सब लोग स्वीकार करते थे,
कहा जा रहा कि अब वो दौर बदल गया, खेमेबाजी का दौर शुरू हो गया कई क्षत्रप उभर आए यही वजह है कि सेंट्रल से लेकर स्टेट तक ऐसा हाल है न वहां पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष तय करना उतना सहज रह गया है और न यहाँ मंत्रिमंडल का विस्तार तभी न साल- पौने दो साल से ये स्थिति है…
ये बताई जा रही वजह
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के चयन प्रक्रिया में विलंब के एक नही अनेक कारण बताए जा रहे, एक तो ये है कि कुछ राज्यो में अभी तक संगठनात्मक चुनाव ही पूरे नहीं हुए हैं। कहा जा रहा कि इन चुनावों के पूरा होने के बाद ही नए राष्ट्रीय अध्यक्ष का चयन किया जा सकता है, दूसरा आरएसएस और भाजपा नेतृत्व के बीच सहमति का न बन पाना है, आरएसएस चाहती है कि भाजपा का अगला राष्ट्रीय अध्यक्ष युवा हो जो संगठनात्मक कौशल और वैचारिक मार्गदर्शन में सक्षम हो, और तीसरी वजह बड़े नेताओं की नाराजगी का डर है।
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