0 आज तक किसी भी अफसर ने क्यो नही कराई हेडकाउंटिंग बड़ा सवाल है
0 कईं ऐसे ठेकेदार जिन्होंने 40-50 श्रमिक देने टेंडर लिया उनके पास 10 श्रमिक भी नही


बिलासपुर। कई आईआईएस आये और गए परन्तु किसी ने हेडकाउंटिंग नही कराई। मामला शहर के 8-9 ठेकेदारो द्वारा नगर निगम प्रशासन को ठेके पर मुहैय्या कराए जा रहे 1370 श्रमिको के नाम पर हर माह किये जा रहे 1 करोड़ 80 लाख रुपये के भुगतान का है जिसका किस्सा लंबे समय से चर्चा में है।

चर्चा ये भी है कि 40-40, 50-50 लेबर सप्लाई का ठेका लेने वाले ज्यादातर ठेकेदारो के पास गिनती के 10 लेबर तक नही है। अब सवाल यह उठ रहा कि जब इतने लेबर ही नही जितने बताए जा रहे तो आखिर 1370 श्रमिको के नाम पर हर माह निगम के अकाउंट से भुगतान किए जा रहे 1 करोड़ 80 लाख रुपये जा कहां रहे।

तब आया था मामला सामने
पूर्व में यहाँ निगम आयुक्त रहे आईएएस यशवंत कुमार ने शहर को स्वक्छ बनाने सफाई व्यवस्था की मॉनिटरिंग के लिए इंजीनियरों और अफसरों की भी डयूटी लगाई। वे खुद भी निकलते थे जब वे गांधी चौक के पास निरीक्षण के लिए पहुँचे और नाले के जाम को देख उन्होंने नाराजगी जाहिर कर कार्यपालन अभियंता और ठेकेदार को फटकार लगाई तो ठेकेदार के मोबाइल घनघनाते ही बाइक में। नाला साफ करने का झक्कड़ और रापा ले दो श्रमिक पहुचे। इसके बाद आयुक्त सरकंडा क्षेत्र में सीपत रोड़ का जायजा लेने पहुँचे और गन्दगी देख नाराजगी जताई तो ठेकेदार के कॉल करने पर फिर वही दो बाइक सवार लेबर वहाँ भी पहुच गए। उन्होंने दोनों को पहचान लिया और उस समय के ईई से सवाल किया कि क्या ठेकेदार इन्ही दो लेबर के भरोसे ठेका चला रहा क्या उसके पास और लेबर नही है।
सबका साथ सबका विकास-
कुल मिलाकर मामला सबका साथ सबका विकास का है। तभी तो ठेकेदार अफसर सब लाल और सालों से काम कर रहे लेबर और शहर की वे व्यवस्थाएं फटेहाल है जिनके नाम पर हर माह 1 करोड़ 80 लाख का भुगतान होते आ रहा।
एडवांस घोटाले पर डाल दी राख
इससे पहले भी नगर निगम में ठेका श्रमिको के पारिश्रमिक में उनके मेहनताने के लगभग आधी रकम को एडवांस दर्शा 93 करोड़ के झोल का पोल खुल चुका है। पर विडम्बना है कि जिसने इस घोटाले को उजागर किया उसी अफसर को निबटा दिया गया। दबंग ठेकेदारो ने यहां से उनका तबादला करा उनकी जांच रिपोर्ट को ही दफन करा दिया।
इसीलिए कंगाल
इसी तरह के कारनामो के चलते नगर निगम आर्थिक बदहाली के दौर से गुजर रहा। वेतन तक के लिए हर माह सरकार से फंड के लिए डिमांड करना पड़ रहा। नही तो निगम प्रशासन के पास इतनी शक्ति है कि यदि इसका सही दिशा में उपयोग किया जाय तो कभी फंड की कमी नही होगी इतने प्रावधान है।
और कौन रोकेगा इन्हें
चर्चा है कि निगम के कुछ पदाधिकारियों और पूर्व पदाधिकारियों व अफसरों ने पात्रता न होते हुए भी अपने निवास में गार्डन गाड़ी और घर के काम के लिए इन्ही ठेका श्रमिको को अपने पास रख रखा है।
और निगम करता है मासिक पेमेंट-
नगर पालिक निगम के रिकार्ड के मुताबिक निगम प्रशासन हर माहH वेतन और पारिश्रमिक पर 5 करोड़ 65 लाख रुपये खर्च करता है।
310 -दैनिक टास्क – 35 लाख
1370 प्लेसमेंट स्टाफ 1 करोड़ 80
800 लगभग नियमित 3.50 करोड़
और ये सच्चाई
सीजीडीएनए ने पड़ताल के दौरान कुछ ऐसे युवाओं का पता लगाया जिन्हें बिना ठेकेदार ठेके में काम किये बिना मासिक एक निश्चित रकम का भुगतान किया जा रहा है। इनमे एक निजी संस्थान में कार्यरत युवा भी शामिल है। उसने बताया कि उसे 1000 तो कभी 1500 रुपये दिया जाता है। उसने जब ठेकेदार से पीएफ और ईएसआईसी का नम्बर मांगा तो ठेकेदार ने जवाब दिया कि केवल आपके नाम का उपयोग किया जा रहा फिलहाल ऐसा नही है जब होगा आपको नम्बर भी बता देंगे।
जरूरत पड़ी तो सीजीडीएनए इसका प्रमाण भी दे देगा।
निगम आयुक्त ने भी किया स्वीकार
पिछले दिनों निगम आयुक्त ने भी सीजीडीएनए के संवाददाता के समक्ष चर्चा के दौरान इस बात को कि ठेका श्रमिको के नाम पर धांधली चल रही है न सिर्फ स्वीकार किया बल्कि यह भी बताया कि शहर के कुछ जोन में उन्होंने खुद इस धांधली को पकड़ा है।
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