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सरकार की जमीन सरकार का पहाड़, बेखौफ खोद रहे ठेकेदार, आदिवासी जमीन के नाम पर बड़े खेल का भी आरोप

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0 मामला आदिवासी परिवारों के 52 एकड़ जमीन महावीर कोल कम्पनी के नाम रजिस्ट्री कराने का

0 क्या गरीब आदिवासियो की जमीन को कौड़ी के दाम बेचने चल रही साजिश


बिलासपुर। सामाजिक कार्यकर्ता दिलीप अग्रवाल,उदय सिंह,शंकर यादव,राजेश साहू और चेलाराम सहित अन्य ग्रामीणों ने बिलासपुर प्रेस क्लब में पत्रकारों से चर्चा करते हुए
खरगहनी के आदिवासी परिवारों के 52 एकड़ जमीन को अवैध तरीके से महावीर कोल कंपनी के नाम पर बेच से छल करने का आरोप लगाया। साथ ही पूरे प्रकरण के जांच की मांग की।

सामाजिक कार्यकर्ता और ग्रामीणों ने कहा कि कलारतराई के बांकीघाट मे पहाड़ को काटकर और अवैध खनन कर पत्थर और मुरुम का अवैध परिवहन किया जा रहा।
खनिज विभाग ने लीज और इस कदर खनन की अनुमति कैसे दे दी यह बड़ा सवाल है। यदि समय रहते इस अवैध उत्खन्न पर रोक नही लगाई जाती तो पहडों का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा। सरपंच ने शिकायत भी दर्ज कराई पर आज तक कोई कार्यवाही नही की गई है।
समाजिक कार्यकर्ताओ ने कहा कि खनिज विभाग और क्रेशर मालिक के बीच मिलिभगत का इससे बड़ा जीता जागता उदाहरण और क्या हो सकता है। रोजाना पहाड की कटाई और खुदाई करा हजारों ट्रिप मुरुम और पत्थर महावीर कोलवासरी के रेल्वेसाईडिंग पर डंप कराया जा रहा। साथ ही महावीर कोल वसरी के साथ गोयल क्रेशर के रेल्वेसाईडिंग की भी जांच कराई जाये कि इतना पत्थर और मुरुम आया कहां से इसका जवाब किसी के पास नही है।
सामाजिक कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों का कहना है कि बाकिघाट में राजस्व की नहीं वन और,जलसंसाधन विभाग की जमीन है। उन्होंने गोयल क्रेशर के साथ साथ महावीर कोलवाशरी पर भी मामला दर्ज करने मांग की है।
उनका कहना है कि इन अफ़सरो और खनिज माफियाओं ने नेशनल ग्रीन ट्युबनल और भारत सरकार के नियम को ताक में रखकर जिस तरह से अवैध उत्खन्न कर करोडो रुपये की राजस्व की चोरी की है, पहाड को निस्तोनाबुत किया है यह बेहद गम्भीर और चिन्ताजनक है। इन कार्यकर्ताओ और ग्रामीणों ने पहाड़ को कटवाने और खुदवाकर पत्थर और मुरुम निकलवाने कोल वासरी गोयल क्रेशर, और आदिवासियो की जमीन में नियम विरुद्ध खेल करने वालो के खिलाफ क्क़र्रवाई की मांग की है। साथ ही
कार्यवाही न होने पर एन.जी.टी. और हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने की बात कही है।


सरकार की जमीन सरकार का पहाड़, बेखौफ खोद रहे ठेकेदार, आदिवासी जमीन के नाम पर बड़े खेल का भी आरोप

कौन है वो अरबपति ड्राइव्हर


इस पूरे प्रकरण में झराखण्ड के एक वाहन चालक की भूमिका चर्चा में है, जो कम्पनी के संचालक की गाड़ी चलाता है। आरोप है कि इसी चालक ने आदिवासी होने का फायदा उठा आदिवासियों की जमीनें कौड़ियों के दाम अकेले खरीद ली और फिर संचलक के नाम रजिस्ट्री कर दी। इस गणित में सवाल यह उठ रहा कि साहेब का 15-“20 हजार रुपये मासिक वेतन वाले सारथी के पास इतना पैसा आया कहा से ये भी जांच का विषय है।


कौन खेल रहा आदिवासियों के जमीन को हथियाने का खेल


आदिवासियों की जमीन को आदिवासी ही खरीद सकता है। यदि कोई और खरीदना चाहे तो उन्हें कलेक्टर से अनुमति लेनी पड़ती है। इसी का फायदा उठाकर समाज के कतिपय रसूखदार ही इनकी जमीनें आने पौने में खरीद लेते है क्योंकि वे और किसी को बेच नही सकते। कलेक्टर के अनुमति की प्रक्रिया भी इतनी मजबूत है कि केवल रसूखदार ही पार पा पाएंगे। उनके प्रकरण पता नही कैसे खटाखट पास हो जाते है जबकि आम आदमी के चप्पल घिस और उम्र बीत जा रही। सवाल यह उठ रहा कि क्या इस नियम से अपने भोले स्वभाव के लिए जाने जाने वाले आदिवासियों का भला हो रहा या वे छले जा रहे ये विचारणीय प्रश्न है।

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