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कह रहे बुनकर किसका साथ किसका विकास और कैसा सुशासन, महंगाई के इस दौर में ढाई-तीन सौ रुपये में काट रहे जीवन


0 सरकार के मजदूरी के गाइड लाइन के राडार के लिए भी अपात्र
0 बोले बुनकर जब तक हाथ पैर चल रहा तभी तक खेल फिर कोई पूछने वाला नही

बिलासपुर। आजादी के 70 और छत्तीसगढ राज्य की स्थापना के 24 साल बाद भी बुनकरों के हालात नही बदले। करीब दर्जन भर परिवार 50-52 साल से यह काम कर रहे और आज भी 250-300 रुपये रोजी में स्कूली बच्चों के ड्रेस के लिए कपड़े बुन रहे है। जबकि सरकार ने कुशल अकुशल श्रमिको के दर तय कर रखे हैं पर ये किसी श्रेणी में नही है। आज भी 15 परिवार बहतराई चौक के जर्जर भवन में सूत की कताई कर कपड़े बुनने के काम मे लगे है।

आज से 54 साल पहले सन1970 में बिलासपुर बुनकर समिति का गठन कर बहतराई चौक में कपड़ा बुनने का कारखाना स्थापित किया गया था। यहाँ 15 लोग नही 15 परिवार राजधानी रायपुर से आने वाले धागे का कांडा बनाने और कपड़ा बुनने के काम मे लगे है। इनके परिवार के बच्चे और महिलाएं कांडा में धागे लपेटकर मशीन में फंसाने देते है, इसी धागों के काडे को मशीन में फंसाकर कपड़े बुनते है और रोजो मिलती है महज 33-34 रुपये मीटर के हिसाब से।

ये बुनकर दिन भर मेहनत कर बमुश्किल 8- 10 मीटर स्कूल ड्रेस का कपड़ा बनाकर 300-330 रुपये कमाते है जिससे इनके परिवार का गुजारा होता है। जिले में लोफन्दी में 3 गनियारी, लखराम और रानी गाँव में 1 और विलासपुर में बहतराई और कोसा सोसायटी इस समिति में शामिल है।


ये है दर


बुनकर परिवारों को दिन भर आंख गड़ाकर और हाथ चलाकर हाड़ तोड़ मेहनत करने के बावजूद शर्ट के कपड़ा बुनाई का 37.92 रुपये पेंट के कपड़े का 34.70 रुपये और
ट्यूनिक यानी लड़कियों के ड्रेस के कपड़ा बुनाई का महज 33 रुपये मीटर के दर से भुगतान किया जाता है।

रायपुर से गाड़ी आती है

धागा रायपुर से आता है और यहाँ से कपड़ा ले जाते समय कपड़े के नाप के हिसाब से इन बुनकरों को भुगतान किया जाता है।


ऐसे चल रहा जीवन


पीड़ित बुनकरों का कहना है कि जब से होस सम्भाले यही काम कर रहे अब दूसरा काम कर नही सकते इसलिए किसी तरह दिन काट ले रहे।सरकार से चावल और काम का 250- 300 रुपये रोजी मिल जा रहा उसी से जीवन चला रहे। शादी विवाह और गमी सब लगा है जीवन मे उधार और गिरवी रखकर ये सब भी किसी तरह निबटा लेते है।


पहले से तो ठीक है


बुनकरों का कहना है कि साल दो साल पहले तो और भी बदतर हालात थे। धागा नही आ रहा था हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते थे अब तो रायपुर सेभरपूर धागा आ रहा भाजपा सरकार ने उनके पारिश्रमिक में 20 परसेंट का इजाफा भी किया तब ये हालात है। नही तो पहले सभी तरह के कपड़े का महज 27.80 रुपये पति मीटर के डर से पारिश्रमिक मिलता था वो भी समय बेसमय।


है सुविधाएं


बुनकरों का कहना है कि भवन भले जर्जर है लेकिन बिजली पानी शौचालय सबकी सुविधा है।


जब तक हाथ चल रहा तब तक ठीक


बुनकरों का कहना है कि इतने साल बाद भी सरकारों ने पारिश्रमिक के अलावा उनके लिए और कोई प्रावधान नही किया। न पेंशन है न कोई राहत जब तक हाथ पैर चल रहा तब तक है। पूरा उम्र खप गया।

तब थे 500 बुनकर परिवार

उचित पारिश्रमिक न मिलने के कारण नई पीढ़ी ये काम नही करना चाहते। नही तो पहले 500 बुनकर परिवार कपड़ा बुनाई का काम करते थे। तब यहां कपड़ा बनता था रँगाई छपाई सब होता था। 1985-86 जनता साड़ी धोती बन्द तब हुआ तब से हालात बिगड़े।

ये है सरकार की मजदूरी दर


गवर्नमेंट समय – समय पर कुशल अकुशल और अर्ध कुशल श्रमिको के पारिश्रमिक का दर निर्धारित करती है। पर बुनकर समिति समेत न जाने और कितनीं संस्थाए है जो इस सरकारी पारिश्रमिक दर वाले गाइडलाइन के राडार में नही आते। इतना बड़ा श्रम मंत्रालय है श्रम विभाग का भारी भरकम अमल है । गाड़ियों में श्रम विभाग लिखवाकर दौड़ने वाले अफसर है पर कोई घ्यान नही दे रहा सब सुशासन और सबका साथ सबका विकास का नारा बुलंद करने में लगे है।

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शैलेन्द्र पाण्डेय / संपादक / मोबाइल नंबर : 7000256145
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