
बिलासपुर। अरपा-भैंसाझार नहर परियोजना में शासन और किसानों को करोड़ो का चूना लगाने के मामले में कलेक्टर और कमिश्नर की जांच रिपोर्ट में तत्कालीन कोटा के दो तत्कालीन एसडीएम, नायब तहसीलदार आरआई, पटवारियो को दोषी ठहराए जाने और इस मामले में
सिंचाई विभाग के तत्कालीन ईई एसडीओ एसडीओ सब इंजीनियर की भूमिका स्प्ष्ट होने के बाद कार्रवाई के बजाए अब ईओडब्ल्यू से पूरे प्रकरण की जांच के आदेश से सरकार की जग हसाई हो रही, लोग पूछ रहे कि सरकार को क्या अपने कलेक्टर- कमिश्नर की जांच पर भरोसा नही। अब उन्हें कौन बताये की जांच बोले तो…? बताया जा रहा कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने अब मामले की जांच आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (EOW) से कराने आदेश दिए हैं। राजस्व और सिंचाई विभाग के अफसरों पर आरोप है कि उन्होंने खास लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए नहर की डिजाइन तक कागजों में बदल दी।

ये है मामला
आरोप है कि कोरोना महामारी के दौरान कोटा के तत्कालीन एसडीएम और पटवारी ने सिंचाई विभाग के अधिकारियों के साथ मिली भगत कर एक व्यापारी को फर्जी भूस्वामी बनाकर उसे 48 गुना दर से 3.42 करोड़ का मुआवजा दे दिया। भांडा तब फूटा जब असली जमीन मालिक की जमीन पर अचानक खुदाई के लिए जेसीबी पहुंची और किसान ने इसका विरोध किया कि बिना किसी सूचना और
मुआवजे के उसकी जमीन कैसे अधिग्रहित की जा रही। किसान जब ज्ञापन लेकर कलेक्टर के समक्ष गुहार लगाने पहुँचा तब पूरे घोटाले की सच्चाई सामने आ गई। असली किसान है कि जमीन पर नहर बनने के बाद आज तक मुआवजे के लिए दर-दर भटक रहे हैं।

पटवारी की करामात
आरोप है कि पटवारी मुकेश साहू ने अपनी कलम की करामात से बंजर जमीन को दोफसली और झोपड़ी को मकान दिखाकर व्यवसायी मनोज अग्रवाल को 3 करोड़ 42 लाख रुपये का भुगतान करा दिया, जबकि यह जमीन नहर से करीब 200 मीटर दूर है,और इसके अधिग्रहण का राजपत्र में प्रकाशन भी नहीं हुआ था।
कलेक्टर और कमिश्नर ने इन्हें पाया दोषी
कलेक्टर और कमिश्नर की जांच रिपोर्ट में तत्कालीन कोटा एसडीएम आनंदस्वरूप तिवारी और कीर्तिमान सिंह राठौर, नायब तहसीलदार मोहरसाय सिदार, आरआई हुल सिंह, पटवारी दिलशाद अहमद और मुकेश साहू सकरी सहित पांच राजस्व कर्मी दोषी पाए गए हैं। वहीं, सिंचाई विभाग के तत्कालीन ईई कोटा आरएस नायडू, ईई कोटा एके तिवारी, तत्कालीन एसडीओ कोटा राजेंद्र प्रसाद मिश्रा, तत्कालीन एसडीओ तखतपुर आरपी द्विवेदी और सब इंजीनियर तखतपुर आरके राजपूत की भी मामले में भूमिका होना पाया गया।
पटवारी बना बलि का बकरा साहब बना दिये गए आरटीओ
जांच रिपोर्ट में इन अफसरों व कर्मचारियों समेत 11 लोगो के दोषी पाए जाने के बाद भी सिर्फ एक पटवारी पर कार्रवाई कर मामले का पटाक्षेप करने की कोशिश की गई। प्रमुख दोषी को बिलासपुर का आरटीओ बना दिया गया।
काम अधूरा बजट डबल
अरपा-भैंसाझार परियोजना का शुरुआती बजट 606 करोड़ रुपये था, करामाती अफसरों ने इसे बढाकर लगभग दुगना 1141.90 करोड़ रुपये कर दिया। वो भी तब जब 370.55 किलोमीटर नहर में से केवल 229.46 किलोमीटर नहर ही बन सका। सवाल यह उठ रहा कि जब कलेक्टर- कमिश्नर की जांच रिपोर्ट में 11 आरोपी दोषी पाए गए तो क्या ईओडब्ल्यू की जांच की जरूरत क्यो?
पीछे- पीछे दौड़ रहे दागी
बताया जा रहा कि दागी अफसरों ने फेविकोल वाला फार्मूला अपनाया है। यही वजह है कि जिले में जहाँ भी सीएम का दौरा होता है, ये अफसर अपने पूरे स्टाफ के साथ वहाँ आवभगत के लिए पहुँच जा रहे।
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