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पंडित देवकीनन्दन औषधालय के आखिरी डॉक्टर के रिटायरमेंट के साथ निगम के स्वास्थ्य विभाग का भी अंत, स्वास्थ्य विभाग का मुख्यालय बन गया सफाई दफ्तर

बिलासपुर। पंडित देवकीनंदन दीक्षित औषधालय के आखिरी डॉक्टर बनवाली शर्मा के रिटायरमेंट के बाद नगर निगम को शिक्षा के बाद अब चिकित्सा से भी छुटकारा मिल गया। दवाइयों की बर्निया और खरल सब गायब हो गए। इसके बाद निगम के स्वास्थ्य विभाग का मुख्यालय कहलाने वाला यह दफ्तर सफाई दफ्तर बनकर रह गया है।
शहर के दानवीर सर्वस्व दानी पंडित देवकीनन्दन दीक्षित ने बिलासपुर वासियों को इलाज के लिए गोलबाजार शास्त्री मार्केट के पास औषधालय के लिए जमीन और भवन, शिक्षा के लिए पंडित देवकीनन्दन स्कूल, मनोरंजन के लिए शनिचरी लालबहादुर शास्त्री स्कूल मैदान में पंडित देवकीनन्दन सभागृह और जीवन के अंतिम पड़ाव के लिए अरपापार सरकंडा में मुक्तिधाम के लिए जगह दी थी । निगम प्रशासन द्वारा संचालित देवकीनन्दन स्कूल समेत सभी पांच स्कूल शिक्षा विभाग में मर्ज हो गए। मुक्तिधाम का संचालन निजी हाथों में सौप दिया गया और औषधालय भी अंतिम डॉक्टर श्री शर्मा के रिटायरमेंट के बाद बन्द हो गया। बचा मनोरंजन घर उससे आय आमदनी हो जा रही।

6 औषधालय, 6 डॉक्टर

निगम के मूलभूत सुविधाओं में पहले जनस्वास्थ्य भी शामिल था। नगर निगम प्रशासन द्वारा निगम सीमा में तालापारा, बंधवापारा, मुंगेली नाका, कतियापारा, शंकर नगर और देवकीनन्दन औषधालय में 4 आयुर्वेदिक और 2 होम्योपैथी औषधालयों में 6 डॉक्टर और स्टाफ थे। जहां डॉक्टर शहरवासियों को चिकित्सा परामर्श और दवाइयां देते थे। धीरे धीरे डॉक्टर रिटायर होते गए नए डॉक्टरों की भर्ती ही नही की गई नतीजतन जनस्वास्थ्य की रक्षा करने वाले अस्पताल डॉक्टरों के रिटारमेंट और उनके मौत के साथ बन्द होते गए।

लोकप्रिय हुई तो बन्द हो गए अस्पताल

पिछले कुछ सालों में आमजन का झुकाव आयुर्वेद और होम्योपैथी की ओर बढ़ा है। लोग एलोपैथी के बजाय आयुर्वेद और होम्योपैथी की ओर आकर्षित हुए, लोगो को भान हुआ कि एलोपैथी तत्कालिक राहत देती है जबकि आयुर्वेद और होम्योपैथी रोगों का जड़ से इलाज और निदान करता है। पारम्परिक चिकित्सा पद्धतिया लोकप्रिय हुए तो निगम के अस्पताल बन्द हो गए। इन अस्पतालों में मरीजो की पंजीयन संख्या में इजाफा भी हुआ लेकिन परवाह किसे है।

तो दौड़ता था निगम का अमला

नगर निगम क्षेत्र के रहवासियों के जनस्वास्थ्य का जिम्मा पहले निगम के इन औषधालयों पर था, जब भी शहर के विभिन्न इलाकों में डायरिया या अन्य संक्रामक बीमारियों का संक्रमण होता था डॉक्टर अमले और दवाइयों के साथ न सिर्फ मौके पर पहुँच पीड़ितों का इलाज करते थे, बल्कि डोर टू डोर जाकर भी उपचार और दवाइयां देते थे अब वो भी सहारा नही रहा।

तंखा डेढ़-डेढ़ लाख दवाई कुछ नही


निगम में इतने सारे आईएएस अफसर आये और गए पर किसी ने ध्यान नही दिया। डॉक्टरों को सवा से डेढ़-डेढ़ लाख तक वेतन का भुगतान किया जाता था पर दवाइयां 10 हजार तक कि नही खरीदी जाती थी नतीजतन मरीजो को बाहर से दवाई लिखी जाती रही।


बड़े बड़े लोग कराते थे इलाज


एक समय था जब शहर के नामचीन लोग निगम के इन अस्पतालों में इलाज कराने आते थे। पूर्व मंत्री अशोक राव खुद पंडित देवकीनंदन औषधालय में इलाज कराते थे। और भी ऐसे अनेक नाम है।

दानपत्र में स्पष्ट उल्लेख

बताया जा रहा कि शहर के मुख्यमार्ग से लगे पंडित देवकीनन्दन औषधालय के बड़े भू भाग पर बड़े बड़ो की नजर है, न जाने यह कब की बिककर काम्प्लेक्स में तब्दील हो गई होती लेकिन सर्वस्वदानी पंडित देवक़ीननन्दन दीक्षित ने दानपत्र में इस बात का साफ साफ उल्लेख किया है कि इस जमीन को न बेचा जा सकेगा न इसका उपयोग परिवर्तित होगा ये औषधालय है और औषधालय ही रहेगा।
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