
बिलासपुर। शतप्रतिशत मतदान के लिए प्रशासन के तमाम दावों और जनजागरूकता के बावजूद बिलासपुर नगर निगम के मेयर और 70 वार्डो के पार्षदो को चुनने महज 51.37 फीसदी मतदान हुआ। यानि 48. 63 परसेंट मतदाता मतदान करने तक नही निकले। आखिर इसकी वजह क्या है क्या इसका पता लगा मतदान के प्रति लोगो को प्रेरित करने प्रशासन के पास और कोई आइडिया नही है।
मतदाताओं के आकड़ो पर गौर करे तो बिलासपुर के 70 वार्डो के 2 लाख 52 हजार 317 पुरुष, 256261 महिला और तृतीय लिंग के 80 मतदाताओं समेत 5 लाख 86 हजार 58 मतदाताओ को मेयर और पार्षद पद के लिए 2-2 वोट डालने थे।
लेकिन मंगलवार को हुए मतदान के दौरान 2 लाख 52 हजार 317 पुरुषो में से 1 लाख 32 हजार 406 मतदाताओ ने तो 256261 में से 1 लाख 28 हजार 893 महिलाओ और 80 में से महज 15 तृतीय लिंग मतदाताओ ने अपने मताधिकार का उपयोग किया। यानि 5 लाख 86 हजार 58 में से 2 लाख 47 हजार 344 मतदाताओं ने अपने मताधिकार का उपयोग हो नही किया।
ये चौकाने वाले आंकडा न्यायधानी, एजुकेशन हब और स्मार्ट सिटी कहलाने वाले बिलासपुर नगर निगम क्षेत्र के निवासरत मतदाताओ का है। जो बेहद चिंताजनक है, प्रशासन को भी दिखावे के जनजागरण के बजाय इस पर गौर करते हुए नवाचार करने की आवश्यकता है, ताकि आगामी चुनाव में इस तरह की स्थिति को बेहतर किया जा सके।
इसी तरह नगर पालिका परिषद के 19 हजार 411 में से 14423 मतदाताओ ने मतदान किया यहां 75.51 फीसदी मतदान हुआ।

देखिये जिले के सात निकायों में मतदान की क्या स्थिति रही…

आखिर क्या है वजह
बड़ा सवाल यह है कि आखिर न्यायधानी के 2 लाख 47 हजार 344 वोटरों ने मतदान क्यो नही किया…
0 क्या उन्हें राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों के घिसे पिटे चेहरे पसन्द नही है।
0 क्या उन्हें लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर भरोसा नही है।
0 क्या वे मान चुके है कि इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया से उनका कोई भला होने वाला नही है
0 क्या वे नेताओ के ढोल ताशे और चुनाव के दौरान रोज रोज दरवाजा खटखटाने से नाराज है।
0 क्या मतदाता नेताओ के मतदान केंद्र बाहर होने वाले मारपीट और गुंडागर्दी के कारण मतदान करने के लिए जाने से कतरा रहे है
शासन प्रशासन और राजनीतिज्ञयो को इस पर विचार करने की जरूरत कि आखिर इसकी वजह क्या है इसका भी सर्वे कराया जाना चाहिए।
अब कितना कचोटेगा नोटा
चर्चा इस बात की है कि ये तो ट्रेलर था, अभी मतगणना के दिन नोटा कितने ने दबाया ये भी स्प्ष्ट हो जाएगा। नोटा बोले तो न ये पसन्द न वो पसन्द जैसा है, ये विकल्प है उन मतदाताओ के लिए जो एक को नागनाथ और दूसरे को सांपनाथ कहते है। चर्चा है कि इस बार तो दोनों मुख्य राजनीतिक दल से जुड़े असन्तुष्ट नेताओ ने भी खुलकर नोटा दबाया है।
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