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4 दिन के सुशासन तिहार में साढ़े 17 लाख समस्याओं के आवेदन, तो फिर क्या कर रहे अफसर और सरकारी अमला

0 निराकरण शब्द नही पूरा खाखा सार्वजनिक किया जाए कैसे किया निराकरण
0 पारा 42 के पार फिर क्यो नौनिहालों की जान से खिलवाड़, क्यो गरियाबंद की महिला को खून से राष्ट्रपति को लिखनी पड़ रही चिट्ठी

गरियाबंद जिले के ग्राम छुरा की 70 वर्षीया दलित पीड़ित महिला ओमबाई अपने खून से राष्ट्रपति को चिट्ठी लिख लगा रही न्याय की गुहार

बिलासपुर। खुली नजर क्या खेल दिखेगा दुनिया का, बन्द आँख से देख तमाशा दुनिया का। बिग बी के फ़िल्म का ये गीत सुशासन तिहार की एक बानगी है। जमीन सम्बन्धी मामले में संरक्षित प्रजाति की महिला को राष्ट्रपति के नाम खून से पत्र लिखना पड़ रहा कि उसकी जमीन दबंगो से वापस दिलाई जाए। 42- 43 डिग्री सेल्सियस तापमान की तपिश से बच्चों को बचाने संगठनों और जनप्रतिनिधियों को आवेदन देना पड़ रहा कि इससे बच्चो की सेहत बिगड़ेगी।
इससे ज्यादा चौकाने वाली बात यह है कि सुशासन तिहार के दौरान आये 15 हजार आवेदनों का निराकरण करना बताया जा रहा। यदि इस सुशासनी त्योहार से लोगो की समस्या का वाकई में निराकरण हो रहा तो अच्छा है

दबंगो से अपनी जमीन दिलाने और मठ तोड़ने वालों के खिलाफ कर रही कार्रवाई की मांग

पर सवाल यह उठ रहा कि दर्जनों विभाग है, लाखो अधिकारी कर्मचारी है इसके बावजूद प्रदेश भर से पहले चरण में 8 अप्रैल से 11 अप्रैल तक 4 दिन में 17 लाख 47 हजार 218 लोग सरकार को समस्याओं के आवेदन दे रहे तो फिर ये सरकारी अमला कर क्या रहा। फिर इन्हें किस काम के लिए हर माह करोड़ो में वेतन दिए जा रहे है। क्यो सरकार को लोगों की समस्याओं को जानने के लिए सुशासन तिहार का आयोजन करना पड़ रहा। क्यो उनसे आवेदन मंगाए जा रहे है।
सरकार को चाहिए कि एक-एक विभाग के आवेदनों की छटनी कराकर विभाग के जिम्मेदार अफसरों से जवाब तलब किया जाए कि ये स्थिति क्यो वे और उनका अमला आखिर क्या कर रहा।

भीषण गर्मी में बच्चों को गर्मी से राहत दिलाने पार्षद विजय ताम्रकार ने की कलेक्टर से मांग

आमतौर पर सरकारे इस तरह के आयोजन इस बात का पता लगाने करती है कि जनता के बीच सरकार की छबि कैसी है, सरकारी विभागों में उनके कामकाज हो रहे या नही सरकारी मशीनरी कैसे काम कर रही है, कही तनखैया अफसर और कर्मचारी उनकी छवि तो खराब नही कर रहै। अब ये सरकार तय करे कि 4 दिन में आये साढ़े 17 लाख आवेदनो के सुशासनी दाग क्या अच्छे है।


जरूरत इस बात की है कि जनभागीदारी समिति का गठन कर एक-एक आवेदनों की स्क्रूटनी की जाए, जिन लोगो की समस्यायों का निराकरण करने का दावा किया जा रहा उनके नाम, किस समस्या के लिए आवेदन किया गया, और उनकी समस्या का क्या और कैसे निराकरण किया गया आवेदक का मोबाइल नम्बर की सूची कलेक्ट्रेट के बोर्ड में चस्पा की जाय ताकि ये जाहिर हो कि सचमुच उनकी समस्याओं का समाधान करना बताया जा रहा वह सही है या सरकारी शब्द निराकरण लिख कर मामले को टरका दिया गया। क्यो कि सवाल सरकार की साख का है।

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शैलेन्द्र पाण्डेय / संपादक / मोबाइल नंबर : 7000256145
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