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जो न भौंके, न काटे, न संगठित हो वही लोकतंत्र में उपेक्षित, गौमाता की सेवा बन गई कमजोरी, भौंकने वालों को न्याय, शांत रहने वालों को तिरस्कार…

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छत्तीसगढ़,,,, जिले में हाल ही में एक अभूतपूर्व सामाजिक और न्यायिक विमर्श देखने को मिला, जिसमें कुत्तों से जुड़ी घटनाओं ने सुप्रीम कोर्ट तक को अपने फैसले पर पुनर्विचार के लिए मजबूर कर दिया! आवारा कुत्तों द्वारा काटे जाने की बढ़ती घटनाओं के बावजूद जब उनके अधिकारों की बात आई, तो न सिर्फ कोर्ट बल्कि देश का अभिजात्य वर्ग भी सड़कों पर उतर आया! सुप्रीम कोर्ट ने भी सार्वजनिक दबाव को देखते हुए अपने पुराने आदेश को बदला! यह दर्शाता है! कि जो समाज में ज़ोर से चिल्लाता है! आक्रामकता दिखाता है! गिरोह बनाकर दबाव बनाता है! उसकी आवाज़ लोकतंत्र में ज़्यादा सुनी जाती है!

वहीं दूसरी ओर, गाय — जो भारतीय सनातन संस्कृति का प्रतीक है! और जिसे गौमाता कहा जाता है! चुपचाप दूध देकर मनुष्य की सेवा करती है! उसका गोबर और मूत्र धरती को उपजाऊ बनाते हैं! वह न चिल्लाती है! न काटती है! न विरोध करती है! लेकिन दुर्भाग्य से, उसका शांत स्वभाव ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बनता जा रहा है! कोर्ट और समाज के उच्च वर्ग के लिए गाय की उपयोगिता अब गौण होती जा रही है!

यह विरोधाभास भारतीय लोकतंत्र का एक कटु सत्य उजागर करता है! कि जो ज्यादा आवाज़ उठाता है! दबाव बनाता है! उसकी चिंता होती है! और जो चुप रहता है! सेवा करता है! उसकी उपेक्षा होती है! हिन्दू समाज, जो गौपूजक है! अपने मूल स्वभाव की वजह से आज हाशिये पर धकेला जा रहा है!

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