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अब ओशो की धरोधर बचाने मैदान में उतरे देश के नामी वकिल हरीशंकर जैन व विष्णु शंकर जैन

  • अयोध्या में रामजन्म भूमि मामले में केस बडी भूमिका निभा चुके हैं जैन
  • पुणे स्थित 3000 करोड का आश्रम विवादो में
  • ओशो की सारी बौद्धिक संपदा पर विदेशियों का कब्जा
  • ओशो की समाधि तक मानने से इंकार
  • आश्रम का एक प्लॉट 100 करोड में बेचने की भी हुई थी साजिश
  • बिलासपुर। पुणे/ क्रांतिकारी आध्यात्मिक गुरु और दार्शनिक ओशो (आचार्य रजनीश) का पुणे आश्रम फिर से चर्चा में है। अब इस आश्रम को बचाने जारी केस में अयोध्या रामजन्म भूमि केस को जीतनेवाले नामी वकील हरिशंकर जैन और विष्णु शंकर जैन की एंट्री हो गई है।
    बिलासपुर नगर पालिक निगम के पूर्व मेयर व वरिष्ठ कांग्रेस नेता राजेश पाण्डेय ने बताया कि
    पुणे के पॉश इलाके कोरेगांव पार्क के ओशो के पहले ओशो इंटरनेशनल मेडिटेशन रिसोर्ट आश्रम के ओशो की माला, प्रॉपर्टी और किताबों के कॉपीराइट को लेकर ओशो के अनुयायी कई सालो से कोर्ट में लगे हुए हैं, इसका प्रबंधन करने वाली संस्था ओशो इंटरनैशनल फाउंडेशन (OIF) से खफा हैं। इल्जाम है कि यहां से धीरे-धीरे ओशो का प्रभाव घटाया जा रहा है। इसे कोमर्सियल किया जा रहा है। ओशो के देह त्यागने के बाद यहां की चीजें तेजी से बदली हैं। आरोप यह भी है हाल में ही आश्रम का एक हिस्सा जिसे बाशो कहा जाता है, उसे एक नामी उद्योगपति को 100 करोड में बेचने की तैयारी हो गई थी। इसके 3 एकड़ एरिया को दो हिस्सों में करके बेचा जा ने वाला था। लेकिन ओशो के शिष्य इसके खिलाफ कोर्ट में गए और इस बिक्री पर रोक लगाई। इसमें एक तरफ ओलिंपिक साइज का स्विमिंग पूल है तो दूसरे में टेनिस कोर्ट आदि हैं।
    ओशो के शुरुआती शिष्यों में से एक स्वामी चैतन्य कीर्ति कहते हैं कि ‘पुणे के चैरिटी कमिश्नर से ओशो फाउंडेशन ने इसे बेचने की परमिशन के लिए अप्लाई किया गया था। इनकी डील भी हो गई लेकिन यह प्राइवेट प्रॉपर्टी नहीं है, लाखों लोगों की डोनेशन से तैयार हुई जगह है। यह गुरु की समाधि का स्थान है। इस आश्रम की जगह को कैसे बेचा जा सकता है? इसलिए ओशो शिष्य इस मुद्दे पर कोर्ट पहुंचे थे।’ ओशो के एक अन्य शिष्य योगेश ठक्कर का दावा है कि सिर्फ पुणे में डेढ़ हजार करोड़ की प्रॉपर्टी है। वह बताते हैं कि आश्रम 28 एकड़ में बना हुआ है। 18 एकड़ पर मालिकाना हक है और 10 एकड़ जमीन सरकार ने लीज़ पर दी हुई है, जहां गार्डन बना हुआ है।ओशो के समर्पित शिष्य रतन गुरुबानी का दावा हैं,
    कि ओशो की इंटलैक्चुअल प्रॉपर्टी के राइट्स भारत से बाहर यानी स्विट्जरलैंड में चले गए हैं। इसके लिए वहां ट्रस्ट बनाए गए हैं। यूरोप, अमेरिका, आयरलैंड आदि में शेल कंपनियां बनी हुई हैं। वे ट्रस्ट से सीधे काम लेकर पब्लिशिंग आदि का काम करती हैं। हमने यह बात बॉम्बे हाईकोर्ट के नोटिस में डाल दी। यह भारत की प्रॉपर्टी है। मई 2013 में हमने यह कोर्ट को बताया। उसी साल जून में ओशो की एक नकली वसीयत यूरोप की कोर्ट में आई। ट्रेड मार्क की सुनवाई के दौरान यह वसीयत रखी गई। हमें ओशो की मृत्यु के 24 साल बाद यह पता चल रहा था कि ऐसी भी कोई वसीयत है। फिर इसकी जांच कराई तो फर्जीवाड़ा निकला। इसके लिए भी सिविल और क्रिमिनल केस चल रहा है।’
    उधर, चैतन्य कीर्ति कहते हैं, ‘हम चाहते हैं कि ओशो का आश्रम देश की धरोहर बन जाए। 16 फरवरी को प्रधानमंत्री को भी चिट्ठी भेजी गई है। इस मामले को संसद में उठाया जाना चाहिए। केस कोर्ट में है .पहले तो ओशो फाउंडेशन ने यह भी मानने से इनकार कर दिया था कि ओशो इंटरनैशनल रिज़ॉर्ट में ओशो की समाधि है। तब कोर्ट ने कहा कि वहां समाधि है और ओशो प्रेमियों को वहां जाने से रोका न जाए। 11 अगस्त 2022 के फैसले के बाद हम समाधि पर जा सकते हैं। यह ओशो की पूरी विरासत का मामला है

इल्जाम यह भी लगाया जा रहा है कि ओशो इंटरनैशनल फाउंडेशन ताकतवर विदेशी लोगों के हाथों में पहुंच गया है। ओशो इंटरनैशनल फाउंडेशन ट्रस्ट का अब प्रमुख विदेशी शिष्य है जिसका नाम स्वामी अमृतो है। इसके अन्य पांचों ट्रस्टी भारतीय हैं। इनके नाम अमृत साधना, देवेंद्र सिंह देवल, लाल प्रताप भारती, मुकेश सारदा और विद्या खूबचंदानी हैं।
इस पर ओशो की एक समर्पित शिष्या मा निवेदिता कहती हैं कि ये भारतीय टूस्टी सिर्फ नाम और दिखावे के लिए है . असल में ये ट्रस्टी विदेशियों के हाथ की कठपुतलियां हैं जो उनके इशारो पर नाचते हैं ।
ओशो की तस्वीरें हटीं, उत्सव बंद –
ओशो प्रेमी सवाल करते हैं कि ओशो की सारी बौद्धिक संपदा पर विदेशियों का हक कैसे हो सकता है। उनकी 650 किताबों का 50 से ज्यादा भाषाओं में अनुवाद हुआ है। रॉयल्टी भी काफी आती है। ओशो के एक अन्य शिष्य शशिकांत सदैव कहते हैं, ‘हर जगह से ओशो की तस्वीरें क्यों हटाई जा रही हैं?’
साल 2000 के बाद आश्रम में नियमों को बदलते देख रहा हूं। हम ओशो फाउंडेशन के नियमों का विरोध करते हैं। इनमें ओशो की तस्वीर वाली माला पहनने पर लगा बैन भी शामिल है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ओशो से दीक्षा लेने वाले शुरुआती लोगों में शामिल रहीं मां धर्म ज्योति ने कहा कि साल 1979 से ओशो के जाने के बाद (1990) यानी 2000 तक मैं आश्रम में रही। पहले हर शनिवार को संन्यास सेलिब्रेशन होता था। गुरु पूर्णिमा, ओशो बर्थडे, संबोधि दिवस, परिनिर्वाण दिवस और ओशो के पिता के शरीर छोड़ने के दिन को सेलिब्रेट किया जाता था। फिर ओशो से जुड़े उत्सवों पर क्यों रोक लगाई गई?

महंगी एंट्री, समाधि से छेड़छाड़! –
ओशो इंटरनैशनल में एंट्री के लिए भारतीयों को एक दिन के लिए 970 रुपये देने होते हैं। भारतीय ओशो प्रेमी इस महंगी एंट्री कहते हैं। इस पर IOF की ओर से अमृत साधना कहती हैं, ‘इस इंटरनैशनल स्तर के रिजॉर्ट का रखरखाव आसान नहीं है। यहां करीब 250 कमरे हैं। इसलिए स्टाफ पर भी काफी खर्चा करना पड़ता है।’ शशिकांत आरोप लगाते हैं कि साल 2012 से मैनेजमेंट ने यह कहना शुरू किया कि वहां ओशो की कोई समाधि नहीं है। उनकी तस्वीर वहां से हटा दी गई है। उस जगह पर च्वांगत्सु ऑडिटोरियम बना दिया गया है। ओशो द्वारा लिखवाए गए शब्दों वाला संगमरमर भी अब वहां नहीं है। वह पोडियम टूटा हुआ है, जहां अपनी कुर्सी पर बैठकर ओशो प्रवचन देते थे।
ओशो को 21 मार्च 1953 को ज्ञान मिला था। इसे संबोधि दिवस कहा जाता है। मुद्दा शुरू हुआ इस उत्सव को मनाने की मांग के साथ। स्वामी चैतन्य कीर्ति बताते हैं, ‘मैं ओशो के नव संन्यास आंदोलन के साथ करीब 50 साल से जुड़ा हुआ हूं। मैंने ओशो साहित्य का संपादन भी किया है। साल 2000 के बाद आश्रम में नियमों को बदलते हुए देख रहा हूं। संबोधि दिवस पर आश्रम पर पुलिस बल भी मौजूद था और अंदर जाने की इजाजत मिल गई। लेकिन अगले दिन फिर माला पहनकर अंदर जाने से रोका गया।’ बता दें इस घटना में पुलिस ने लाठीचार्ज किया और केस भी दर्ज हुआ।

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शैलेन्द्र पाण्डेय / संपादक / मोबाइल नंबर : 7000256145
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