

0 क्या कर रहे पाठ्यपुस्तक निगम के जिम्मेदार

0 क्यो नही सप्लायर, ट्रांसपोर्टरों पर नियंत्रण,
बिलासपुर/ इसको कहते है खाने को चना नही बाबू माँगय जायफल तनखा साढ़े 5 सौ गले मे टांगे रायफल। कुछ ऐसा ही हाल शिक्षा महकमे का है,बिलासपुर जिले में शैक्षणिक सत्र शुरू हुए चार माह बीत गए तिमाही परीक्षा का टाइम हो गया, लेकिन अभी तक हजारों छात्र-छात्राओं को पूरी किताबें नहीं मिली। बताया जा रहा कि जिले में 92 हजार से ज्यादा किताबों की कमी है।
इसके चलते विद्यार्थियों को सहपाठियों से किताब का जुगाड़ कर फोटोकॉपी कराना पड़ रहा तो कई बच्चे पिछले साल की किताबों के सहारे परीक्षा की तैयारी करने विवश है। वो भी संभागीय जिला मुख्यालय के स्कूलो में जबकि शहर से महज 13- 14 किलोमीटर दूर गतौरी में पाठ्य पुस्तक निगम का डिपो है।
बताया जा रहा कि ये हाल तब है जब किताबों की कमी दूर करने मुंगेली और सक्ती से अतिरिक्त किताबें मंगाई जा चुकी है…!
ऐसे में कैसे सुधरेगा शिक्षा का स्तर
शिक्षकों को हड़काने से रिजल्ट नही सुधरेगा,,, जरूरत सप्लायरों और ट्रांसपोर्टिंग व्यवस्था को दुरुस्त कर व्यवस्था बनाने की हैं, क्योकि जब पाठ्यक्रम की पुस्तकें ही नही तो विद्यार्थी पढ़ेंगे क्या और परीक्षा क्या देंगे क्योकि स्व सुशांसन के दावे को घोड़ा चढ़ाने का है।
बेटी पड़ाव बेटी बचाव- किताब खुद बिसाव
ट्रिपल इंजन की सरकार का नारा है सर्वशिक्षा और बेटी पढाव- बेटी बचाव पर सरकारी शिक्षा की कमर किस कदर टूटी है आप खुद सोचिए छत्तीसगढ़ में कम छात्र संख्या (ग्रामीण क्षेत्रों में 10 से कम और शहरी क्षेत्रों में 30 से कम दर्ज संख्या) वाले कुछ स्कूलों को नजदीक के स्कूलों में समायोजित कर बन्द कर दिया गया। कांग्रेस शासन काल के बम्पर हिट स्वामी आत्मानन्द स्कूलो से केजी- एलकेजी को बन्द करने का फरमान जारी किया गया। शिक्षा विभाग के सीने से इतना बड़ा बोझा उतारने के बाद ऊपर से आत्मानन्द स्कूलो में फीस लागू कर दी जो पूरा निशुल्क था। पब्लिक समझ नहीं पा रही कि बेटी पड़ाव बेटी बचाव और शिक्षा सबके लिए शिक्षा का अधिकार क्या ये केवल चुनावी दांव है।



