
बिलासपुर/ दीगर प्रान्त की दो कम्पनियों और लोकल ठेका श्रमिको को हर माह सवा 6 करोड़ के भुगतान के बाद भी शहर की सफाई व्यवस्था का हाल बेहाल है… 8 जोन कमिशनर, 70 वार्ड के पार्षदो मेयर, निगम कमिशनर, स्वास्थ्य अधिकारी समेत कई मुकर्दम है इसके बावजूद विकास तो दूर सफाई तक नही करा पा रहे। करदाता मुख्यमार्ग से लेकर गलियों तक गन्दगी के ढेर में डेरा डाले खतरनाक मवेशियों के बीच जान में जोखिम डालकर आवागमन करने विवश है। जबकि यहाँ काम शुरू करने से पहले लायन्स सर्विसेज के चंडीगढ़ वाले साहब ने दावा किया था कि काम शुरू होने के बाद सड़क पर कचरे का एक टुकड़ा तक नही दिखेगा, इन तस्वीरों में आप खुद इस दावे के भकाढे को देखि लीजिए…




ये तस्वीर जूनाबिलासपुर के पास मस्जिद गली की है, जहाँ सड़क तक बड़े गंदे तरीके से कचरा बिखरा है, और उस पर गाय और सांढो के झुंड चारा तलाश रहे है, ये एक जगह की तस्वीर तो एक बानगी है, इस तरह का नजारा आपको दयालबंद सेंट्रल बैंक के पास, दयालबंद- टिकरापारा मन्नू चौक के बीच सड़क किनारे, सिम्स के पास मिलन मंदिर के सामने समेत शहर के और भी कईं जगह दिख जाएंगे पर ये जिम्मेदारों को क्यो नही दिखता वे ही जाने…
1 नम्बर में खर्चा 6 करोड़ 26 लाख
0 नगर निगम प्रशासन द्वारा लायन्स सर्विसेज को शहर के मुख्यमार्ग से लेकर गलियों व बाजारों की साफ-सफाई और रोड, फुटपाथ व डिवाइडर की धुलाई का ठेका 3 करोड़ 35 लाख मासिक पर दिया गया है…
0 नगर निगम प्रशासन द्वारा डोर- टू- डोर कचरा संकलन कर कचरे को वार्डो में एक जगह एकत्र कर उठाव कराने और कचरे परिवहन कर कछार प्लांट में कचरे के सम्पूर्ण निदान के का काम एमएसडब्ल्यू सॉल्यूशन (रामकी) फर्म को 2115 रुपये प्रति टन के हिसाब से ढिया गया है, दावा है कि एक दिन में करीब 200 शहरी कचरा निकलता है, यानि हर माह कम्पनी को 1 करोड़ 26 लाख 90 हजार का भुगतान किया जा रहा।
0 इसके अलावा निगम के जनप्रतिनिधियों और अफसरो के करीबियों को नाले- नालियों की सफाई के लिए 8 ठेकेदारों को लेबर सप्लाई का काम दिया गया है। ठेकेदार 40-40, 50-50 लेबरो का कागज चला रहे है कितने ये भी जग जाहिर है फिर भी सब चल रहा। लेबर ठेकेदारों को भी कम से कम 70 से 80 लाख भुगतान किया जा रहा, ये तो रहा जिसका सीधा हिसाब है, पर इसके साथ निगम के अमले और संसाधनों से ठेका फर्मो की बेगारी में खर्च होने वाले ईंधन का तो कोई हिसाब ही नही है।
सब ठेके पर फिर कहां जा रहा 60-70 लाख का डीजल-पेट्रोल
कह सकते है कि निगम में जनप्रतिनिधियों और अफसरो को छोड़ सब ठेके पर है, कई बार यह सवाल उठ चुका है कि जब सफाई, कचरे का उठाव, निर्माणकार्य सब कुछ ठेके पर है तो फिर निगम की गाड़ियों में हर माह 60-70 लाख का पेट्रोल- डीजल खर्च हो कैसे रहा,,, आखिर कौन सा पहाड़ फोड़ा जा रहा, परन्तु न तो आज तक किसी ने एक्शन लिया न इसकी पड़ताल कराई गई जिससे ये रहस्य आज तक बरकरार है कि इतना डीजल-पेट्रोल डकार कौन रहा है।
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